रानि कुचालि सुनत नरपालहि

चौपाई २, दोहा २७१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि॥ भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥ २ ॥

अर्थ

रानी की कुचाल सुनकर राजा जनकजी को कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणि के बिना साँप को नहीं सूझता। फिर भरतजी का राज्य और श्रीरामचन्द्रजी का वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजी के हृदय में बड़ा दुःख हुआ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद