देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू
चौपाई २, दोहा २६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥ २ ॥
अर्थ
हे देव! आपने सारा भार मुझ पर रख दिया। पर मुझ में न तो नीति का विचार है, न धर्म का। मैं तो अपने स्वार्थ के लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त के चित्त में चेत नहीं रहता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद