उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई
चौपाई ४, दोहा २६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥ ४ ॥
अर्थ
हृदय में भी तुम पर कुटिलता का आरोप करने से यह लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। माता कैकेयी को तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद