तासु बचन मेटत मन सोचू
तासु बचन मेटत मन सोचू
चौपाई ४, दोहा २६४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ
उनके वचन को मेटने में मन में सोच होता है। उससे भी अधिक तुम्हारा संकोच है। उस पर गुरुजी ने मुझे आज्ञा दी है। इसलिए अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद