देव एक बिनती सुनि मोरी

चौपाई ४, दोहा २६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना॥ ४ ॥

अर्थ

हे देव! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिए। तिलक की सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, यदि प्रभु का मन माने तो उसे सफल कीजिए (उसका उपयोग कीजिए)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद