मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं
चौपाई २, दोहा २६४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥ २ ॥
अर्थ
मुनियों के निकट पक्षी और मृग चले जाते हैं, पर हिंसा करने वाले बधिकों को देखकर भाग जाते हैं। मित्र और शत्रु को पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भण्डार है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद