उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई

चौपाई ३, दोहा २६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥ ३ ॥

अर्थ

स्वामी की आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवक को देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणों का ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभु को उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी आप स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद