अब कृपाल मोहि सो मत भावा
अब कृपाल मोहि सो मत भावा
चौपाई ४, दोहा २६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥ ४ ॥
अर्थ
हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामी का मन संकोच न पावे। प्रभु के चरणों की शपथ है, मैं सत्य भाव से कहता हूँ, जगत् के कल्याण के लिये एक यही उपाय है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद