जगु अनभल भल एकु गोसाईं

चौपाई ४, दोहा २६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥ देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥ ४ ॥

अर्थ

सारा जगत् बुरा हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है; वह न कभी किसी के सम्मुख है, न विमुख।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद