चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची
चौपाई २, दोहा २७० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची॥ जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए॥ २ ॥
अर्थ
किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभु की यह स्थिति देखकर सारी सभा सोच में पड़ गयी। उसी समय जनकजी के दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजी ने उन्हें तुरंत बुलवा लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद