सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू
चौपाई ४, दोहा २६० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥ ४ ॥
अर्थ
बचपन से ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा (मेरे मन के प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय में भलीभाँति देखा (अनुभव किया) है। मेरे हारने पर भी खेल में प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद