नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी
नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी
चौपाई ४, दोहा २७१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥ ४ ॥
अर्थ
[जब किसी ने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजा ने धीरज धर कर हृदय में विचारकर चार चतुर गुप्तचर अयोध्या भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुम लोग [श्रीरामजी के प्रति] भरतजी के सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसी को तुम्हारा पता न लगने पाये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद