पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला

चौपाई ३, दोहा २६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥ यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥ ३ ॥

अर्थ

इन सबने मिलकर पाँव रोपकर मुझे घेरा था। शरणागत-पालक ने अपना प्रण निभाया। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेद में विदित है, छिपी नहीं है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद