भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे
चौपाई १, दोहा २७० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी॥ १ ॥
अर्थ
भरतजी के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाये। अयोध्या निवासी असमंजस के वश हो गये। तपस्वी और वनवासी लोग मन में परम आनन्दित हुए।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद