भूपति मरन पेम पनु राखी
भूपति मरन पेम पनु राखी
चौपाई १, दोहा २६२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥ देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं॥ १ ॥
अर्थ
प्रेम के प्रण को निबाहकर महाराज (पिताजी) का मरना और माता की कुमति, दोनों का सारा संसार साक्षी है। माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरी के नर-नारी दुःसह ताप से जल रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।
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श्रीराम-भरतादि का संवाद