सुनि मुनि बचन राम रुख पाई

चौपाई १, दोहा २६० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥ लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥ १ ॥

अर्थ

मुनि के वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर—गुरु तथा स्वामी को भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरतादि का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सभा में श्रीराम और भरत के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा विषयक गंभीर संवाद का वर्णन है।

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श्रीराम-भरतादि का संवाद