आयसु होइ त रहौं सनेमा

चौपाई ४, दोहा ३२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥ समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥ ४ ॥

अर्थ

आज्ञा हो तो मैं प्रेमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकित शरीर होकर प्रेम के साथ बोले—हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत में धर्म का सार होगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास