भूसुर बोलि भरत कर जोरे
भूसुर बोलि भरत कर जोरे
चौपाई २, दोहा ३२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥ २ ॥
अर्थ
ब्राह्मणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आप लोग ऊँचा-नीचा, अच्छा-बुरा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास