मंगलाचरण

अरण्यकांड का आरंभ विनयपूर्ण मंगलाचरण से होता है। तुलसीदास प्रभु श्रीराम, सीताजी और गुरु चरणों का स्मरण कर कांड को पावन भाव से आरंभ करते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १ / १८

प्रकरण पाठ

श्लोक

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्‌। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्‌॥ १ ॥

अर्थ:

धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमल के सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरनेवाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न-भिन्न करने की विधि में आकाश से उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्मकुल के कलंक को शान्त करनेवाले, श्रीरामभूप के प्रिय श्रीशङ्करजी की मैं वन्दना करता हूँ।

श्लोक

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्‌। राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥ २ ॥

अर्थ:

जिनका शरीर जलयुक्त मेघों के समान सुन्दर (श्यामवर्ण) एवं आनन्दघन है, जो सुन्दर पीताम्बर धारण किये हैं, जिनके हाथों में बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित है, कमल के समान विशाल नेत्र हैं और मस्तक पर जटाजूट धारण किये हैं, उन अत्यन्त शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित पथ में चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी को मैं भजता हूँ।