प्रीति प्रतीति बचन मन करनी
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी
चौपाई ३, दोहा ३२१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥ ३ ॥
अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन और कर्म की प्रीति तथा प्रतीति का अपने श्रीमुख से वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जल की मछलियाँ, चित्रकूट के चर-अचर सभी जीव उदास हो गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास