देह दिनहुँ दिन दूबरि होई

चौपाई १, दोहा ३२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥ १ ॥

अर्थ

भरतजी का शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज घट रहा है, बल और मुखछवि वही बनी हुई है। राम-प्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है, और मन मलिन नहीं है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास