परिजन पुरजन प्रजा बोलाए

चौपाई ३, दोहा ३२३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥ ३ ॥

अर्थ

भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को, नगरवासियों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर, उनका समाधान करके उन्हें सुखपूर्वक बसा दिया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित वे गुरुजी के घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले—

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास