राम पेम भाजन भरतु बड़े न
राम पेम भाजन भरतु बड़े न
दोहा ३२४ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥ ३२४ ॥
अर्थ
फिर भरतजी तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस करनी से बड़े नहीं हुए; यह उनके लिये कोई बड़ी बात नहीं है। पृथ्वी के जल न पीने की टेक से चातक की और नीर-क्षीर-विवेक की विभूति से हंस की भी सराहना होती है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का दोहा ३२४ है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास