सुनि सिख अभिमत आसिष पाई

चौपाई २, दोहा ३२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥ रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाईं॥ २ ॥

अर्थ

उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता-पिता दोनों ओर की प्रीति में समायी (बहुत देर तक निमग्न) रहीं! [तब] श्रीरघुनाथजी ने सुन्दर पालकियाँ मँगवायीं और सब माताओं को आश्वासन देकर उन पर चढ़ाया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास