जटाजूट सिर मुनिपट धारी

चौपाई २, दोहा ३२४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥ २ ॥

अर्थ

सिर पर जटाजूट और मुनि-पट धारण कर, भूमि खोदकर कुश की आसनी सँवारी। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत और नियम—सब बातों में वे ऋषि-धर्म का कठिन आचरण प्रेम सहित करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास