परम पुनीत भरत आचरनू

चौपाई ३, दोहा ३२६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥ ३ ॥

अर्थ

भरतजी का परम पवित्र आचरण मधुर, मंजु, मुद-मंगल करनेवाला है। वह कलियुग के कठिन कलुष और कलेशों को हरनेवाला है। वह महामोह-रूपी रात्रि को दलनेवाला दिनेश है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास