जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे
चौपाई २, दोहा ३२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥ सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥ २ ॥
अर्थ
जैसे शरद् ऋतु के प्रकाश में जल घटता है, पर बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं, वैसे ही शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजी के हृदयरूपी निर्मल आकाश के नक्षत्र हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास