भरत रहनि समुझनि करतूती
भरत रहनि समुझनि करतूती
चौपाई ४, दोहा ३२५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरों की तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वती की भी पहुँच नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास