भूषन बसन भोग सुख भूरी
भूषन बसन भोग सुख भूरी
चौपाई ३, दोहा ३२४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥ ३ ॥
अर्थ
गहने, वस्त्र, भोग-सुख और बहुत-सी संपत्तियाँ मन, तन और वचन से तिनके की तरह त्याग दीं। अयोध्या का राज्य देवराज इन्द्र भी सिहाते थे, और दशरथजी की धन-संपत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास