बिदा कीन्ह सनमानि निषादू

चौपाई १, दोहा ३२१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥ १ ॥

अर्थ

फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था। फिर कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगों को लौटा दिया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास