सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत
छन्द, दोहा ३२६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
छन्द पाठ
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनिमन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
अर्थ
श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि विषम व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख, दाह, दरिद्रता, दंभ और दूषणों को अपने सुयश के बहाने कौन हरता? तथा कलिकाल में तुलसी जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता?॥
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का छन्द, दोहा ३२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।
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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास