तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा

चौपाई ४, दोहा ३२४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥ ४ ॥

अर्थ

उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास [भोगैश्वर्य] को वमन की भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास