पाप पुंज कुंजर मृगराजू

चौपाई ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू। जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥ ४ ॥

अर्थ

यह पाप-समूह रूपी हाथी के लिए सिंह है। यह सारे संताप-समूहों को हरनेवाला है। यह जनों को रंजन देनेवाला, भव-भार का भंजन करनेवाला, और श्रीराम-स्नेह रूपी सुधाकर का सार है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी की अयोध्या वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास और भरत-चरित्र श्रवण की महिमा का वर्णन है।

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भरत की वापसी, पादुका स्थापना, नंदिग्राम निवास