लागत बान जलद जिमि गाजहिं

चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥ ४ ॥

अर्थ

बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाण को देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और “पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो” का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।

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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति