नाक कान काटे जियँ जानी
नाक कान काटे जियँ जानी
चौपाई ५, दोहा ६६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥ ५ ॥
अर्थ
नाक-कान काटे गये, ऐसा मन में जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कान का होने से और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में भय उत्पन्न हो गया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति