सोनित स्रवत सोह तन कारे
सोनित स्रवत सोह तन कारे
चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सोनित स्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥ ४ ॥
अर्थ
उसके काले शरीर से रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजल के पर्वत से गेरू के पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति