छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती

चौपाई २, दोहा ७२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥ २ ॥

अर्थ

उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुख से कहने पर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजे से लगाता है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।

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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति