कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा

चौपाई ३, दोहा ६५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥ मुर्‌यो न मनु तनु टर्‌यो न टार्‌यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्‌यो॥ ३ ॥

अर्थ

रीछ-वानर एक-एक बार में ही करोड़ों पहाड़ों के शिखरों से उस पर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टला, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ भी असर नहीं होता।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति