बंधु बचन सुनि चला बिभीषन

चौपाई १, दोहा ६५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥ नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥ १ ॥

अर्थ

भाई के वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकी के भूषण श्रीरामजी थे। [विभीषण ने कहा--] हे नाथ! पर्वत के समान विशाल देह वाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।

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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति