लरहिं सुभट निज निज जय हेतू
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू
चौपाई ६, दोहा ७२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥ ६ ॥
अर्थ
दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जय के लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उनके युद्ध का वर्णन नहीं किया जा सकता।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति