सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा
चौपाई २, दोहा ६८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥ जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥ २ ॥
अर्थ
फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजी ने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल-सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत-से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति