यह निसिचर दुकाल सम अहई
यह निसिचर दुकाल सम अहई
चौपाई २, दोहा ७० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥ कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥ २ ॥
अर्थ
[वे कहने लगे--] यह राक्षस दुर्भिक्ष के समान है, जो अब वानरकुलरूपी देश में पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जल के धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खर के शत्रु! हे शरणागत के दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति