कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा
चौपाई ३, दोहा ६८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥ घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥ ३ ॥
अर्थ
उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वी पर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति