कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा

चौपाई १, दोहा ६७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥ १ ॥

अर्थ

रण के उत्साह में कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [उनके] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरों को एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [वे उसके मुँह में इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वत की गुफा में टिड्डियाँ समा रही हों।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।

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कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति