सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा
चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥ तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥ २ ॥
अर्थ
मुख में बाण भरे हुए वह [प्रभु के] सामने दौड़ा। मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभु ने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कुंभकर्ण के प्रचंड पराक्रम और श्रीराम के हाथों उसकी परमगति का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति