प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की
चौपाई २-३, दोहा २३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥ एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥ उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥ ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥ २-३ ॥
अर्थ
सज्जनगण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। [निर्गुण और सगुण] दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है जो काठ के अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। [तत्त्वतः दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी] दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को [निर्गुण] ब्रह्म से और [सगुण] राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घनराशि है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रामनाम की महिमा” प्रकरण का चौपाई २-३, दोहा २३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामनाम की सर्वोच्च महिमा और कलियुग में नाम-स्मरण के कल्याणकारी प्रभाव का वर्णन है।