अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा

चौपाई १, दोहा २३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥ मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥ १ ॥

अर्थ

निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रामनाम की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामनाम की सर्वोच्च महिमा और कलियुग में नाम-स्मरण के कल्याणकारी प्रभाव का वर्णन है।

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रामनाम की महिमा