कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके
चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥ बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥ २ ॥
अर्थ
ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं; तुलसीदास को तो श्रीराम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनका ('र' और “म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीजमन्त्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहनेवाले (सदा एकरूप और एकरस)।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रामनाम की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामनाम की सर्वोच्च महिमा और कलियुग में नाम-स्मरण के कल्याणकारी प्रभाव का वर्णन है।
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रामनाम की महिमा