नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी

चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥ १ ॥

अर्थ

ब्रह्मा के बनाये हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिन में] जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रामनाम की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामनाम की सर्वोच्च महिमा और कलियुग में नाम-स्मरण के कल्याणकारी प्रभाव का वर्णन है।

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रामनाम की महिमा