राम एक तापस तिय तारी

चौपाई २-३, दोहा २४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥ रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥ सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥ भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥ २-३ ॥

अर्थ

श्रीरामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि सुधार दी। श्रीरामजी ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिये एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। श्रीरामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करनेवाला है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रामनाम की महिमा” प्रकरण का चौपाई २-३, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामनाम की सर्वोच्च महिमा और कलियुग में नाम-स्मरण के कल्याणकारी प्रभाव का वर्णन है।

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रामनाम की महिमा